


थोड़ा समझा, थोड़ा जाना, एक टेक में हो गया पहाड़ी गाना
-वर्ष 1989 में रिकार्ड हुआ था आशा भोंसले का यह गाना
विपिन बनियाल, देहरादून। यह वर्ष 1989 की बात है। मुंबई के एक स्टूडियो में हलचल तेज थी। एक उत्तराखंडी गढ़वाली फिल्मी गाने की रिकार्डिंग होनी थी। गाना आशा ताई यानी आशा भोंसले की आवाज में रिकार्ड होना था। आशा जी स्टूडियो पहुंची, तो फिल्म के हीरो बलराज नेगी और संगीतकार कैलाश थलेड़ी ने गर्मजोशी से उनका स्वागत किया। आशा जी ने पहले गाने के बोल समझे और फिर धुन। इसके बाद, एक ही टेक में उन्होंने गाना गा दिया- ‘जन्मों कू साथ छयो किले त्वेन तोड़ि, कख लुकी ग्वेर छोरा, अधबट्टा मा छोड़ि।’
आशा जी, दुनिया को अलविदा कह गईं हैं । मगर उनकी आवाज, उनके गीतों की खुशबू कभी कम नहीं होंगी । भारतीय फिल्म संगीत को अपनी मखमली आवाज के मार्फत उन्होंने नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया और उसे समृद्ध किया। उनके गाए हिंदी फिल्मी गानों की लंबी फेहरिस्त है। आंचलिक फिल्मों के लिए भी उन्होंने तमाम सारे गाने रिकार्ड कराए। उत्तराखंड का परम सौभाग्य कि उनकी आवाज वाला ‘जन्मों कू साथ’ गीत बेशकीमती धरोहर की तरह हमारेे पास मौजूद है।
वर्ष 1989 में जब यह गीत रिकार्ड किया गया, तब फिल्म का नाम ‘ग्वेर छोरा ‘ था, लेकिन बाद में इसे ‘जन्मों कू साथ’ कर दिया गया। इस सेड सांग को कैलाश थलेड़ी ने न सिर्फ कंपोज किया था, बल्कि लिखा भी खुद ही था। थलेड़ी बताते हैं- ‘गाने के मिजाज को समझने में आशा जी ने जितनी तेजी दिखाई, वह हैरत में डालने वाली थी। एक टेक में उन्होंने यह गाना रिकार्ड करा दिया ‘। थलेड़ी कहते हैं- ‘मुुझ से बड़ा सौभाग्यशाली और कौन होगा, जिसके गाने को आशा जी की मखमली आवाज नसीब हुई ‘।
रिकार्डिंग के दौरान अपने व्यवहार से आशा जी ने स्टूडियो में मौजूद हर एक शख्स को प्रभावित किया। फिल्म के हीरो रहे बलराज नेगी कहते हैं- ‘वह हर एक के साथ आत्मीयता से पेश आई। गायकी में उनके परफेक्शन का तो दुनिया ने लोहा माना है। उनका निधन वास्तव में संगीत जगत की बहुत बड़ी क्षति है ‘।
आशाजी को लेकर पाराशर गौड़ का मलाल
पहली गढ़वाली फिल्म ‘जग्वाल’ बनाने वाले पाराशर गौड़ का आशा जी को लेकर वर्षों पुराना मलाल है। दरअसल, एक समय कुछ लोगों की सलाह पर पाराशर गौड़ ने हिंदी में ‘प्रतीक्षा’ नाम से फिल्म बनाने की तैयारी की थी। इस क्रम में उन्होंने आशा जी से एक गीत रिकार्ड कराया था। इस गीत के बोल थे- ‘अनहोनी हो गई ‘। बाद में हिंदी की जगह गढ़वाली में फिल्म बनाने का पाराशर गौड़ ने निर्णय लिया, तो यह गाना अनुपयोगी ही रह गया। पाराशर गौड़ कहते हैं- ‘आशाजी के गाने का उपयोग ना कर पाने का मलाल है ‘।

