शहादत पर सियासत, स्मारक पर खामोशी

– हर साल 5 सितंबर को फूल-मालाएं, भाषण और घोषणाएं – फिर शहीदों की निशानी को उसके हाल पर छोड़ देती है व्यवस्था

बृजेश तिवारी

खुमाड़ (सल्ट)। जिस धरती ने देश की आजादी के लिए अपने चार सपूतों की कुर्बानी दी, आज वही धरती अपने शहीदों की निशानी बचाने के लिए व्यवस्था का मुंह ताक रही है। सल्ट के खुमाड़ में 1984 में बनाया गया शहीद स्मारक अब बदहाली की तस्वीर बन चुका है। दीवारें टूट रही हैं, भवन जर्जर हो रहा है और रखरखाव के अभाव में वह स्मारक धीरे-धीरे अपनी पहचान खोता जा रहा है। विडंबना देखिए कि शहीदों की शहादत को याद करने के लिए हर साल मंच सजता है, लेकिन उनकी यादों को बचाने के लिए व्यवस्था की नींद नहीं खुलती।

हर वर्ष 5 सितंबर को खुमाड़ में जनप्रतिनिधियों और सियासतदारों का जमावड़ा होता है। माल्यार्पण होता है। शहीदों को नमन किया जाता है। भाषणों में उनके सपनों को पूरा करने के संकल्प दोहराए जाते हैं। स्मारक के विकास और संरक्षण की घोषणाएं भी होती हैं, लेकिन समारोह खत्म होते ही सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। नेता लौट जाते हैं, मंच हट जाता है और घोषणाएं सरकारी फाइलों में कहीं गुम हो जाती हैं। अगले साल फिर वही कहानी दोहराई जाती है। सवाल यह है कि आखिर शहीदों का सम्मान सिर्फ एक दिन का सरकारी-सियासी कार्यक्रम क्यों बनकर रह गया है?

खुमाड़ के शहीद स्मारक को राष्ट्रीय धरोहर का दर्जा दिलाने की मांग लंबे समय से उठती रही है। इसके बावजूद इस दिशा में ठोस पहल दिखाई नहीं देती। जिस स्मारक को आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वतंत्रता संघर्ष की जीवंत निशानी होना चाहिए था, उसकी हालत ही व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े कर रही है।

सरकारें विकास की बड़ी-बड़ी योजनाओं का हिसाब देती हैं। करोड़ों-अरबों रुपये की घोषणाएं होती हैं। नई परियोजनाओं के लिए बजट निकलता है। फिर सवाल यह उठता है कि क्या शहीद स्मारक की टूटी दीवारें ठीक कराने के लिए भी किसी बड़ी घोषणा का इंतजार जरूरी है?

यह मामला सिर्फ जर्जर भवन का नहीं है। यह उस सोच का सवाल है, जिसमें शहीदों को याद करने के लिए फूल तो हैं, लेकिन उनकी विरासत बचाने के लिए इच्छाशक्ति नहीं।राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों के लिए भी यह आत्ममंथन का वक्त है। अगर हर साल शहीदों के नाम पर संकल्प लिया जाता है तो उन संकल्पों का हिसाब भी होना चाहिए। आखिर पिछले वर्षों में की गई घोषणाओं में से कितनी जमीन पर उतरीं? स्मारक के संरक्षण के लिए क्या कदम उठाए गए? राष्ट्रीय धरोहर का दर्जा दिलाने की प्रक्रिया कहां तक पहुंची? इन सवालों के जवाब खुमाड़ की टूटी दीवारें मांग रही हैं। शहीदों की तस्वीर पर फूल चढ़ाना आसान है। मंच से उनके बलिदान को याद करना भी आसान है। मुश्किल है तो उनके सपनों और उनकी विरासत को बचाने की जिम्मेदारी निभाना।

खुमाड़ को भाषण नहीं, संरक्षण चाहिए। स्मारक को माल्यार्पण नहीं, मरम्मत चाहिए। शहीदों को घोषणाएं नहीं, उनके बलिदान की स्थायी पहचान चाहिए। अगर व्यवस्था अब भी नहीं जागी तो आने वाली पीढ़ियां जब खुमाड़ के शहीद स्मारक को देखेंगी, तो उन्हें सिर्फ चार शहीदों की कहानी नहीं दिखेगी—उन्हें यह भी दिखाई देगा कि आजाद भारत ने अपने शहीदों की विरासत के साथ कैसा व्यवहार किया। और तब खुमाड़ की टूटी दीवारों से उठता सवाल और भी कड़ा होगा कि हमने देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ दे दिया,शहादत पर सियासत, स्मारक पर खामोशी शहादत पर सियासत, स्मारक पर खामोशी शहादत पर सियासत, स्मारक पर खामोशीतुमने हमारी यादों को बचाने के लिए क्या किया?

Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement