भाजपा में बगावत के कई चेहरे, कांग्रेस भी अपनों से परेशान

भाजपा में बगावत के कई चेहरे, कांग्रेस भी अपनों से परेशान भाजपा में बगावत के कई चेहरे, कांग्रेस भी अपनों से परेशानकिच्छा में नामांकन के बाद बिगड़ा सियासी गणित

– मुस्लिम और पंजाबी वोटों पर पड़ेगा सीधा असर

– टिकट से बगावत तक सियासी संग्राम, 11 प्रत्याशियो ने भरा पर्चा

चंदन बंगारी

किच्छा। नगर पालिका चुनाव के नामांकन के साथ ही किच्छा की सियासत में तस्वीर काफी हद तक साफ होने लगी है। भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने अपने ही नेताओं की नाराजगी और बगावत चुनौती बनकर सामने आई है, लेकिन नामांकन के बाद बने समीकरणों में सत्तारूढ़ भाजपा फिलहाल ज्यादा मुश्किल में दिखाई दे रही है। भाजपा प्रत्याशी संदीप अरोड़ा के खिलाफ पार्टी से जुड़े चार प्रमुख चेहरों के मैदान में उतरने से मुकाबला कठिन हो गया है। हालांकि पार्टी ने डेमेज कंट्रोल की कवायद शुरु कर दी है।

शुक्रवार को भाजपा प्रत्याशी संदीप अरोड़ा ने पूर्व विधायक राजेश शुक्ला, जिलाध्यक्ष कमल जिंदल सहित अन्य नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ जुलूस निकालकर नामांकन दाखिल किया। वहीं पार्टी की महिला मोर्चा की पूर्व जिलाध्यक्ष शैली फुटेला, पूर्व मंडल अध्यक्ष लवी सहगल, भाजपा कार्यकर्ता नरेंद्र टाकुली और व्यापार मंडल अध्यक्ष विजय अरोड़ा ने भी नामांकन कर दिया। यानी भाजपा के सामने चुनौती सिर्फ विपक्ष से नहीं, बल्कि अपने ही खेमे से खड़े हुए बागियों से भी है।

शैली फुटेला और लवी सहगल की अपनी राजनीतिक पहचान है। दोनों का पंजाबी समाज के मतदाताओं में कुछ हद तक प्रभाव माना जाता है। ऐसे में इनकी बगावत भाजपा प्रत्याशी के लिए वोटों के बिखराव का कारण बन सकती है। किच्छा की राजनीति में जहां हर वर्ग के वोट चुनाव परिणाम तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, वहां एक ही सामाजिक आधार में कई उम्मीदवारों की मौजूदगी मुकाबले को और पेचीदा कर सकती है।

नामांकन में अपनों की गैरमौजूदगी ने बढ़ाई चिंता

संदीप अरोड़ा के नामांकन जुलूस में भाजपा के कई प्रमुख चेहरों की गैरमौजूदगी भी राजनीतिक चर्चा का विषय बन गई। पूर्व जिलाध्यक्ष विवेक सक्सेना, अजय तिवारी, विवेकदीप सिंह, विपिन जलहोत्रा, श्रीकांत राठौड़, कमलेंद्र सेमवाल और विवेक राय समेत कई नेता नजर नहीं आए। इनमें से कुछ नेताओं की ओर से बुलावा नहीं मिलने की बात भी सामने आई है। राजनीति में महज किसी नेता का मंच या जुलूस में मौजूद न होना अपने आप में बगावत नहीं माना जा सकता, लेकिन जब पार्टी पहले से ही टिकट को लेकर असंतोष और बगावत का सामना कर रही हो, तब प्रमुख नेताओं की गैरमौजूदगी संगठन के भीतर चल रही खींचतान का संकेत जरूर देती है।

 

कांग्रेस भी बगावत से अछूती नहीं

कांग्रेस की स्थिति भी पूरी तरह सहज नहीं है। पार्टी प्रत्याशी राजेश प्रताप सिंह ने विधायक तिलकराज बेहड़ और अन्य नेताओं के साथ नामांकन दाखिल किया, लेकिन टिकट की दौड़ में रहे निवर्तमान चेयरमैन दर्शन कोली, सुनीता कश्यप समेत कुछ प्रमुख चेहरे उनके नामांकन में नजर नहीं आए।

इसके अलावा 2013 के निकाय चुनाव में मामूली अंतर से चुनाव हार चुके अब्दुल रशीद जक्कू और जीवन जोशी ने पार्टी से अलग होकर नामांकन कर दिया है। इनमें जक्कू की बगावत कांग्रेस के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अब्दुल रशीद जक्कू को किच्छा में एक बड़ा मुस्लिम चेहरा माना जाता है। उनका चुनाव मैदान में उतरना कांग्रेस के लिए सीधी चुनौती है। यदि वह अपने प्रभाव वाले इलाके और समुदाय में वोट खींचने में सफल रहते हैं तो इसका सीधा असर कांग्रेस के परंपरागत अल्पसंख्यक वोट बैंक पर पड़ सकता है।

यही इस चुनाव का एक बड़ा समीकरण है कि कांग्रेस जहां भाजपा की अंदरूनी लड़ाई का फायदा उठाना चाहेगी, वहीं उसे अपने ही बागी उम्मीदवारों से अल्पसंख्यक वोटों के संभावित बिखराव को रोकना होगा।यूकेडी से अनिल पांडे, निर्दलीय वंदना सिंह, विशाल मदान ने भी नामांकन दाखिल किया है। इनमें से वंदना कांग्रेस प्रत्याशी राजेश की पत्नी हैं। कुल दस प्रत्याशियों के मैदान में उतरने से मुकाबला अब सीधा भाजपा बनाम कांग्रेस तक सीमित नहीं रहा।

नामांकन के बाद किच्छा का चुनाव एक दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है। भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि क्या वह अपने बागियों को मनाकर वोटों के बिखराव को रोक पाएगी? कांग्रेस के लिए भी यही चुनौती है, लेकिन उसके सामने जक्कू की मौजूदगी के कारण सामाजिक समीकरण का अतिरिक्त दबाव है। भाजपा के पास सत्ता, संगठन की ताकत है, लेकिन बगावत के इतने चेहरे मैदान में उतरने से यह ताकत तभी प्रभावी होगी, जब पार्टी अंदरूनी असंतोष को मतदान से पहले नियंत्रित कर सके। दूसरी ओर कांग्रेस भाजपा की बगावत को अपने पक्ष में माहौल बनाने के अवसर के रूप में देख रही होगी, लेकिन अपने घर की नाराजगी उसे यह लाभ आसानी से नहीं लेने दे रही है। किच्छा में अब चुनाव सिर्फ उम्मीदवारों के बीच नहीं, बल्कि संगठनों की अपने-अपने वोट बैंक को एकजुट रखने की क्षमता का भी इम्तिहान बन गया है।

नामांकन ने साफ कर दिया है कि किच्छा में सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, अपनों को साथ रखना है। भाजपा के सामने बागियों की संख्या और प्रमुख नेताओं की नाराजगी ज्यादा मुखर दिखाई दे रही है, जबकि कांग्रेस को जक्कू समेत अपने असंतुष्ट नेताओं से होने वाले संभावित वोट नुकसान की चिंता है। अगर भाजपा डैमेज कंट्रोल में विफल रहती है तो बागी उम्मीदवार उसके लिए निर्णायक वोट-कटवा साबित हो सकते हैं। कांग्रेस के लिए भी राहत की राह आसान नहीं है। अब आने वाले दिनों में जिस दल का डैमेज कंट्रोल जितना मजबूत होगा, चुनावी मुकाबले में उसकी स्थिति उतनी ही मजबूत होगी।

 

 

 

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