उत्तराखंड में कभी घूमते थे गैंडे! 1789 में कोटद्वार के पास दिखा था गैंडा

– अंग्रेज चित्रकारों ने बनाया था उसका स्केच

– असम-काजीरंगा तक सीमित नहीं था गेंडों का दायरा

न्यूज एंड नॉक ब्यूरो

रामनगर। आज गैंडे का नाम आते ही असम के काजीरंगा और बंगाल के जंगल याद आते हैं, लेकिन करीब ढाई सौ साल पहले उत्तराखंड की तराई भी इस विशाल वन्यजीव की मौजूदगी की गवाह थी। 20 अप्रैल 1789 को कोटद्वार के पास एक नदी किनारे पानी पीता गैंडा देखा गया था।

रामनगर में आयोजित कॉर्बेट साहित्य महोत्सव में मध्य प्रदेश के कटनी से पहुंचे रजा काजमी ने इस ऐतिहासिक प्रसंग की जानकारी साझा की। बताया कि ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर में भारत भ्रमण पर निकले अंग्रेज चित्रकार थॉमस डैनियल और विलियम डैनियल की नजर इस गैंडे पर पड़ी। दोनों कोलकाता से गढ़वाल के श्रीनगर की ओर जा रहे थे। नदी किनारे दिखे इस दुर्लभ वन्यजीव का उन्होंने तत्काल स्केच तैयार किया। बताया जाता है कि गैंडे को वहां से भगाने के लिए हवा में गोली चलाई गई, जिसके बाद वह जंगल की ओर चला गया।

इतिहास के दस्तावेजों में गेंडों की मौजूदगी केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं मिलती। मुगलकाल और दिल्ली सल्तनत के दौर के अभिलेखों में पेशावर से लेकर हिमाचल के सिरमौर की तलहटी तक इनके पाए जाने के संकेत मिलते हैं।

समय के साथ जंगलों की कटाई, बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप और शिकार ने गेंडों के प्राकृतिक आवास को खत्म कर दिया। उत्तराखंड से भी यह विशाल वन्यजीव गायब हो गया। 1789 का यह प्रसंग हालांकि बताता है कि आज के उत्तराखंड की तराई कभी कितनी समृद्ध वन्यजीव दुनिया का हिस्सा थी।

 

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