


सुप्रीम कोर्ट ने एक पकड़ा झूठ और सुना दिया ऐतिहासिक फैसला
दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाया है, जो आने वाले समय में घरेलू हिंसा और बंद कमरों के भीतर होने वाले अपराधों पर लगाम लगाने में मददगार साबित होगा। सर्वोच्च अदालत ने साफ कहा है कि अगर घर की चारदीवारी के भीतर कोई अपराध या मौत होती है, तो वहां रहने वाले लोगों की यह कानूनी जिम्मेदारी होगी कि वे ठोस और सच बताएं कि पीड़ित की मौत आखिरकार कैसे हुई।
सोमवार को न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन की पीठ ने इस टिप्पणी के साथ ही अपनी पत्नी की हत्या के दोषी गौर आचार्य की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि घर के अंदर होने वाले अपराधों में शुरुआती जिम्मेदारी भले ही पुलिस और अभियोजन पक्ष की होती है, लेकिन घर के सदस्यों को भी मौत की सही वजह का उचित स्पष्टीकरण देना होगा। कोर्ट ने इस मामले को पूरे समाज के लिए एक बड़ा सबक बताया है। दोषी गौर आचार्य पर IPC की धारा 302 (हत्या) और धारा 498A (विवाहिता पर क्रूरता) के तहत मामला दर्ज था
दरअसल मृतका सोमा आचार्य की शादी के कुछ ही दिनों बाद से उसे दहेज के लिए बेरहमी से प्रताड़ित किया जाने लगा था। सोमा ने कई बार अपने माता-पिता से उसे बचाने की गुहार लगाई थी। वह कुछ दिन अपने मायके भी रही, लेकिन हर बार समझौता कराकर उसे वापस ससुराल भेज दिया गया। गांव के बुजुर्गों ने भी बीच-बचाव कर सुलह कराई थी, लेकिन सोमा का अंत बेहद दुखद रहा। कोर्ट ने भावुक टिप्पणी करते हुए कहा कि सोमा के अपनों को लगा था कि स्थिति सुधर जाएगी, लेकिन उनकी उम्मीदें पूरी तरह टूट गईं।
ससुराल पक्ष ने इसे आत्महत्या का रूप देने की कोशिश की थी, लेकिन मेडिकल रिपोर्ट और पोस्टमार्टम ने पूरी साजिश का पर्दाफाश कर दिया। रिपोर्ट से साफ हुआ कि यह आत्महत्या नहीं बल्कि निर्मम हत्या थी। सोमा को पहले मौत के घाट उतारा गया और फिर फंदे से लटकाया गया। चौंकाने वाली बात यह है कि जब सोमा की लाश मिली, तब उसका पति गौर आचार्य उसी घर में मौजूद था। उसने गवाहों के सामने कहानी गढ़ी कि सोमा ने खुदकुशी की है, लेकिन जब कोर्ट ने सोमा के शरीर पर मौजूद चोटों के निशानों के बारे में पूछा, तो वह निरुत्तर हो गया। कोर्ट ने उसकी सुसाइड वाली दलील को सिरे से खारिज कर दिया।
अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि घर के अंदर होने वाले अपराधों में शुरुआती जिम्मेदारी भले ही पुलिस और अभियोजन पक्ष की होती है, लेकिन घर के सदस्यों को भी मौत की सही वजह का उचित स्पष्टीकरण देना होगा। कोर्ट ने इस मामले को पूरे समाज के लिए एक बड़ा सबक बताया है। दोषी गौर आचार्य पर आईपीसी की धारा 302 (हत्या) और धारा 498A (विवाहिता पर क्रूरता) के तहत मामला दर्ज था। इस मामले में निचली अदालत ने पहले ही गौर के पिता को बरी कर चुकी है, जबकि हाई कोर्ट ने उसकी मां और भाई को भी हत्या के आरोपों से मुक्त कर दिया था क्योंकि वे उसी परिसर में दूसरी झोपड़ी में रहते थे।
अब सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य दोषी पति गौर आचार्य की अंतिम अपील को भी पूरी तरह खारिज कर दिया है। चूंकि गौर आचार्य इस समय कानून की नजरों से बचकर फरार चल रहा है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने त्रिपुरा के पुलिस महानिदेशक को तुरंत एक विशेष टीम गठित कर उसे गिरफ्तार करने और जेल भेजने का सख्त आदेश दिया है।#साभारएजेंसी

