भोजशाला पर बड़ा फैसला: राजा भोज का मंदिर माना गया, नमाज़ पर रोक

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– फैसला  कानून और शांति के साथ लागू हो

– परमार वंश के महाराजा भोज ने बनवाया था भोजशाला

रक्षिता नागर

मध्यप्रदेश। हाईकोर्ट ने भोजशाला पर ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि भोजशाला परिसर एक मंदिर ही है। अब भोजशाला परिसर में किसी भी प्रकार की नमाज या इस्लामिक गतिविधि नहीं होगी। यहाँ केवल हिंदू विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाएगी।

दरअसल, धार भोजशाला का इतिहास प्राचीन भारत की विद्या, कला और स्थापत्य कला का एक अद्भुत उदाहरण है। विवादों की वर्तमान स्थिति से इतर, इसका ऐतिहासिक सफर राजा भोज के शासनकाल और भारतीय ज्ञान परंपरा से गहराई से जुड़ा है। भोजशाला का निर्माण परमार वंश के सबसे प्रतापी राजा, महाराजा भोज (1010–1055 ईस्वी) ने करवाया था। राजा भोज स्वयं एक महान विद्वान, कवि और वास्तुशास्त्री थे। उन्होंने धार (धारा नगरी) को अपनी राजधानी बनाया और यहाँ एक भव्य पाठशाला की स्थापना की, जिसे भोजशाला कहा गया। यह उस समय का एक प्रमुख विश्वविद्यालय था जहाँ व्याकरण, खगोल शास्त्र, संगीत और दर्शन की शिक्षा दी जाती थी। यहाँ देश-दुनिया से विद्वान और विद्यार्थी आते थे।

भोजशाला मुख्य रूप से विद्या की देवी सरस्वती को समर्पित थी। यहाँ देवी सरस्वती की एक अत्यंत सुंदर प्रतिमा स्थापित की गई थी, जिसे ‘वाग्देवी’ के नाम से जाना जाता है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, यह प्रतिमा 1034 ईस्वी में निर्मित की गई थी। (वर्तमान में यह लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में है)। भोजशाला अपनी अनूठी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध थी। इसके स्तंभों और पत्थरों पर काव्य और व्याकरण के सूत्र खुदे हुए थे। यहाँ के पत्थरों पर राजा भोज द्वारा रचित ‘कूर्माष्टक’ (कछुए के अवतार पर आधारित कविता) और कई व्याकरण संबंधी शिलालेख उत्कीर्ण थे।

यह परिसर न केवल एक पाठशाला थी, बल्कि परमारकालीन स्थापत्य कला का एक उत्कृष्ट नमूना भी था, जिसमें नक्काशीदार खंभे और विस्तृत आंगन शामिल थे। 11वीं से 13वीं शताब्दी तक भोजशाला को ‘महान सरस्वती सदन’ माना जाता था। धार उस समय ‘साहित्य की नगरी’ के रूप में विख्यात थी। कहा जाता है कि राजा भोज के दरबार में 500 से अधिक विद्वान हमेशा उपस्थित रहते थे, और भोजशाला उनकी बौद्धिक चर्चाओं का मुख्य केंद्र थी।

अलाउद्दीन खिलजी और बाद में मालवा के सुल्तानों (दिलावर खान और महमूद खिलजी) के आक्रमणों के बाद भोजशाला की स्थिति बदलने लगी। 1305 ईस्वी के आसपास अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के बाद इस परिसर को नुकसान पहुँचाया गया। बाद के वर्षों में, इसके परिसर के भीतर ही विभिन्न मस्जिदों (जैसे कमाल मौला मस्जिद) का निर्माण हुआ, जिसके लिए भोजशाला के ही स्तंभों और सामग्रियों का उपयोग किया गया।

सनातन धर्म की बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा फैसला

अयोध्या में प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर निर्माण के बाद अब सनातन धर्म की एक और बड़ी जीत हुई है। मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला, जो सदियों से मुगलिया अतिक्रमण और विवादों के साये में थी, अब पूर्णतः स्वतंत्र हो गई है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने एक युगांतकारी निर्णय सुनाते हुए भोजशाला को ‘मंदिर’ घोषित कर दिया है। यह फैसला हिंदू समाज के उस अदम्य साहस और धैर्य की जीत है, जो पिछले 700 वर्षों से अपनी सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा था।

एएसआई की सर्वे रिपोर्ट में खुला रास्ता

भोजशाला का भाग्य वर्ष 2024 में तब बदला जब हाईकोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को वैज्ञानिक सर्वे के निर्देश दिए। करीब 98 दिनों तक चले इस विस्तृत सर्वे में आधुनिक तकनीकों जैसे जीपीआर, कार्बन डेटिंग और वीडियोग्राफी का उपयोग किया गया। एएसआई की रिपोर्ट ने वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ यह सिद्ध कर दिया कि इस ढांचे का मूल स्वरूप एक विशाल हिंदू मंदिर का है। इसी रिपोर्ट को आधार मानते हुए हाईकोर्ट ने अपना अंतिम निर्णय सुनाया। इधर, हिंदू पक्ष के वरिष्ठ वकील विष्णु शंकर जैन ने इस फैसले को ‘धर्म की विजय’ बताया है। उन्होंने कहा कि सत्य को अधिक समय तक दबाया नहीं जा सकता। 6 अप्रैल 2026 से शुरू हुई नियमित सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष की ओर से सलमान खुर्शीद ने दलीलें दी थीं, लेकिन पुरातात्विक साक्ष्यों के सामने अतिक्रमणकारी दावे टिक नहीं सके।

 


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